बाबूजी की दुकान

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                मेरा गणित का पर्चा अच्छा हुआ था. पर्चा देते ही मैं बाबूजी की दुकान पर आ गया.                 बाबूजी अपने ग्राहक की सहायता से गोल खर्रे में लिपटी मोटी तार के एक वज़नदार गट्ठर को अपने वज़नी तराज़ू में रखने जा रहे थे.                 “मैं तोल देता हूं,” मैं उदार हो आया, “आप बैठिए, बाबूजी.”                 “पेपर कैसा रहा?” हांफते हुए बाबूजी अपनी कुर्सी पर जा बैठे.