साहस मत छोड़ो

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ऋग्वेद सूक्ति-- (39) की न धृष्णुं त्यजेत--९/९७/७ऋगुवेदभावार्थ --साहस मत छोड़ो।पूरा मूल मंत्र --यहाँ दिया गया संदर्भ ऋग्वेद 9.97.7 से जुड़ा है, जो ऋगुवेद के सोम मण्डल (नवम मण्डल) का मंत्र है। पहले मैं इसका शुद्ध पाठ और फिर अर्थ स्पष्ट करता हूँ। मूल मंत्र (ऋग्वेद 9.97.7)“न धृष्णुं त्यजेत्…” — यह अंश मंत्र का भाव है, पूरा मंत्र इस प्रकार मिलता ह--“न धृष्णुं त्यजेत् सोमो धर्षता सहः ।इन्द्राय पातवे सुतः ॥” (पाठभेद संभव) शब्दार्थन = नहींधृष्णुम् = साहसी, धैर्यवान, वीरत्यजेत् = छोड़ना चाहिएसोमः = सोम (दैवी प्रेरणा/ऊर्जा का प्रतीक)इन्द्राय = इन्द्र के लिएपातवे = पीने हेतुसुतः = निचोड़ा हुआ (तैयार किया गया) भावार्थ (सरल हिंदी