अध्याय :2मानवता की अमर जोत जीवन की राहें हमेशा फूलों भरी नहीं होतीं। कभी-कभी इंसानके जीवन में ऐसा वक्त आता है जब उसे चारों ओर अंधेरा ही अंधेरादिखाई देता है। निराशा के बादल इतने घने हो जाते हैं कि व्यक्ति कोअपनी हस्ती और इस संसार की सार्थकता पर संदेह होने लगता है। ऐसीही मानसिक स्थिति से गुजर रहा था एक व्यक्ति, जो अपनी असफलताओंऔर दुखों के बोझ तले दबा हुआ सड़क के किनारे चला जा रहा था। उसके मन में यह विचार घर कर गया था कि यह दुनिया निष्ठुर है और यहाँकिसी के लिए कोई जगह नहीं है। तभी अचानक उसकी दृष्टि सड़क केकिनारे एक खंभे पर टंगी एक छोटी सी पर्ची पर पड़ी। जिज्ञासावश वहरुका और उसने उस पर लिखे शब्दों को पढ़ा। उस पर्ची पर लिखा था: “मैंएक अत्यंत वृद्ध महिला हूँ। मेरी आँखें कमजोर हो चुकी हैं और मुझे ठीकसे दिखाई नहीं देता। चलते समय यहीं कहीं मेरा 50 रुपये का एक नोटगिर गया है। जिस किसी भी सज्जन को वह मिले, कृपया मुझे मेरे घरआकर लौटा दें। मेरा घर पास की गली में ही है।” उस निराश व्यक्ति केमन में एक हलचल हुई। उसने सोचा कि वह स्वयं तो दुखी है ही, क्यों न इस वृद्ध महिला की मदद करके किसी और के चेहरे पर मुस्कान लाने काप्रयास किया जाए। भले ही उसके पास 50 रुपये का वह नोट नहीं था, लेकिन उसने निर्णय लिया कि वह अपनी जेब से 50 रुपये उस महिला कोदे देगा ताकि उसकी समस्या हल हो सके। वह गली-कूचों से होता हुआउस पते पर पहुँचा, जहाँ एक टूटी-फूटी और जर्जर सी झोपड़ी थी।जैसे ही उसने दरवाजा खटखटाया, एक बहुत ही वृद्ध और कमजोर महिलाबाहर निकली। उसकी आँखों में छाई धुंध बता रही थी कि वह संसार कोस्पष्ट देखने में असमर्थ है। व्यक्ति ने बड़े आदर से कहा, “अम्मा, मुझेसड़क पर आपका वह खोया हुआ 50 रुपये का नोट मिल गया है, मैं वहीआपको लौटाने आया हूँ।” यह सुनते ही वह वृद्ध महिला फफक-फफककर रो पड़ी। उसकी आँखों से बहते आँसू देख वह व्यक्ति अवाक रह गया। उसने अम्मा को चुप कराते हुए पूछा, “अम्मा, आप रो क्यों रही हैं? क्यामैंने कुछ गलत कह दिया?”वृद्ध महिला ने सिसकते हुए जो कहा, उसने उस व्यक्ति के सोचने कानजरिया ही बदल दिया। अम्मा बोलीं, “बेटा, आज सुबह से तुम साठवेंव्यक्ति हो जो मुझे वह 50 रुपये का नोट देने आए हो। सच तो यह है किमैंने वह पर्ची लिखी ही नहीं थी। मुझे तो लिखना भी नहीं आता और मेरीआँखें इतनी कमजोर हैं कि मैं देख भी नहीं सकती। शायद किसी दयालुव्यक्ति ने मेरी गरीबी और लाचारी को देखकर वह पर्ची वहाँ लगा दी होगीताकि लोग मेरी मदद कर सकें।”अम्मा ने आगे कहा, “बेटा, जितने भी लोग आए, मैंने सबको यही कहा किमैं ये पैसे नहीं ले सकती क्योंकि वह मेरा नोट नहीं है। और मैंने हर किसीसे यह विनती की कि जाते समय वह पर्ची फाड़ देना ताकि कोई औरपरेशान न हो। लेकिन हर व्यक्ति मुझसे पैसे लेने का वादा करके गया औरकिसी ने भी वह पर्ची नहीं फाड़ी। हर कोई चाहता था कि मेरे बाद आनेवाला व्यक्ति भी इस बहाने मेरी मदद करे।”उस व्यक्ति की आँखों में चमक आ गई। उसकी निराशा पल भर में दूर होगई। उसे समझ आ गया कि जिस दुनिया को वह बुरा समझ रहा था, वहदरअसल नेक और दयालु लोगों से भरी पड़ी है। अम्मा ने उसे भी वही शर्तदी कि वह जाते समय पर्ची फाड़ दे, लेकिन उस व्यक्ति का मन भी नहींमाना। उसने वह पर्ची वहीं रहने दी ताकि इंसानियत का वह सिलसिलाचलता रहे और किसी जरूरतमंद की मदद होती रहे। उसने महसूस कियाकि जब हम दूसरों के लिए जीना शुरू करते हैं, तो हमारे अपने दुख छोटेलगने लगते हैं।यह घटना हमें सिखाती है कि समाज में अच्छाई कभी खत्म नहीं होती। छोटे-छोटे नेक कार्य मिलकर एक विशाल परिवर्तन ला सकते हैं। जीवन मेंसच्ची खुशी और आत्म-सम्मान तब मिलता है जब हम अपनी स्वार्थ कीपरिधि से बाहर निकलकर दूसरों के आँसू पोंछने का प्रयास करते हैं। सीख / नैतिक संदेश"दुनिया उतनी बुरी नहीं है जितना हम कभी-कभी सोच लेते हैं। मानवताआज भी जीवित है और दूसरों की गुप्त रूप से की गई छोटी सी मदद भीकिसी के जीवन में आशा का दीपक जला सकती है। याद रखिए, जोव्यक्ति दूसरों के लिए खुद को समर्पित करता है, इतिहास और समाज उसेहमेशा सम्मान के साथ याद रखता है।" अध्याय :3अटूट भरोसे की विजय मानवीय जीवन में 'भरोसा' एक ऐसा शब्द है, जिस पर दुनियाके तमाम रिश्तों की बुनियाद टिकी होती है। यह केवल एक शब्द नहीं, बल्कि वह अदृश्य धागा है जो दो हृदयों को जोड़ता है और नामुमकिन कोभी मुमकिन बनाने का साहस प्रदान करता है। इसी अटूट विश्वास की एकमार्मिक कहानी एक युवा विद्यार्थी की है, जिसके जीवन का एकमात्र जुनूनक्रिकेट था। वह अपने महाविद्यालय की क्रिकेट टीम का हिस्सा बननाचाहता था, लेकिन उसकी खेल प्रतिभा साधारण थी।महाविद्यालय के कोच साल भर से उस लड़के को देख रहे थे। उन्हें लगताथा कि इस लड़के में वह फुर्ती और तकनीक नहीं है जो एक उत्कृष्टखिलाड़ी में होनी चाहिए। जब अंतर-महाविद्यालय प्रतियोगिता की घोषणाहुई, तो अभ्यास सत्र शुरू हुए। वह लड़का प्रतिदिन सुबह सात बजेस्टेडियम पहुँच जाता, लेकिन वह अकेला नहीं आता था। उसके साथहमेशा एक वृद्ध व्यक्ति होते थे, जिन्हें वह बड़े प्रेम से स्टेडियम की ऊपरीसीढ़ियों पर बिठा देता और फिर खुद मैदान में पसीना बहाने उतर जाता। अभ्यास खत्म होने के बाद वह फिर उन बुजुर्ग का हाथ थामकर उन्हें घर लेजाता।जैसे-जैसे मैच के दिन करीब आए, टीम का चयन हुआ। कोच ने लड़के कोउसकी कमियों के कारण मुख्य ग्यारह खिलाड़ियों में जगह नहीं दी। लड़का बहुत निराश हुआ, वह कोच के सामने गिड़गिड़ाया, "सर, एक बारमुझ पर भरोसा कीजिए, मैं टीम को जिता सकता हूँ।" कोच ने उसकीभावनाओं का सम्मान करते हुए उसे एक 'अतिरिक्त खिलाड़ी' के रूप मेंटीम में रखा, इस शर्त के साथ कि यदि कोई खिलाड़ी चोटिल होगा तभीउसे मौका मिलेगा। क्वार्टर फाइनल और सेमीफाइनल के मैच बीत गए, महाविद्यालय की टीम जीतती रही, लेकिन उस लड़के को मैदान में उतरनेका अवसर नहीं मिला।अजीब बात यह हुई कि सेमीफाइनल के दिन वह लड़का स्टेडियम नहींआया। कोच को लगा कि शायद उसने हार मान ली है। लेकिन फाइनलमैच के दिन, जब खेल अपने रोमांचक मोड़ पर था, वह लड़का अचानकस्टेडियम पहुँचा। खेल की स्थिति विकट थी; जीत के लिए अंतिम ओवर में24 रनों की दरकार थी और तभी टीम का एक मुख्य बल्लेबाज चोटिल होगया। अब कोई विकल्प नहीं था। लड़के ने फिर से कोच के पैर पकड़लिए और खेलने की अनुमति माँगी। कोच ने हार के डर और लड़के कीजिद को देखते हुए उसे मैदान में भेज दिया।मैदान पर उतरते ही उस लड़के के भीतर जैसे किसी दैवीय शक्ति कासंचार हो गया। उसने वह कर दिखाया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहींकी थी—छह गेंदों पर लगातार छह छक्के जड़कर अपनी टीम को असंभवजीत दिला दी। पूरा स्टेडियम उसके नाम से गूंज उठा, साथियों ने उसे कंधोंपर उठा लिया, लेकिन कोच की आँखों में हैरानी थी। वे यह समझ नहीं पारहे थे कि एक औसत खिलाड़ी ने अचानक ऐसा करिश्मा कैसे कर दिया।जब शोर थमा, तो कोच ने उसे एकांत में बुलाकर पूछा, "बेटा, मैं तुम्हें सालभर से देख रहा हूँ। तुम इतने अच्छे खिलाड़ी कभी नहीं थे। आज यहचमत्कार कैसे हुआ?" लड़के की आँखों में आँसू भर आए। उसने कहा, "सर, आपको याद है वे बुजुर्ग जो रोज मेरे साथ आते थे और सीढ़ियों परबैठते थे? वे मेरे पिता थे। मैं उनसे हमेशा कहता था कि मैं अपनी टीम कासबसे बेहतरीन खिलाड़ी हूँ।" कोच ने टोकते हुए कहा, "लेकिन बेटा, वहतो देख ही नहीं सकते थे, वे तो अंधे थे।"लड़के ने गला भरते हुए उत्तर दिया, "जी सर, वे अंधे थे, इसीलिए मैं उनसेझूठ बोल पाता था ताकि वे मुझ पर गर्व कर सकें। सेमीफाइनल वाले दिनउनका देहांत हो गया। आज वे ऊपर आसमान से मुझे देख रहे हैं। आजपहली बार वे मुझे खेलता हुआ देख पा रहे थे। मैं उनका वह भरोसा, जोउन्होंने मुझ पर ताउम्र रखा, उसे टूटते हुए नहीं देख सकता था। उनके उसविश्वास की लाज रखने के लिए ही आज मेरे बल्ले ने वह कमाल किया।" कोच की आँखें भी भीग गईं; उन्होंने उस वीर पुत्र को गले लगा लिया। सचमुच, जब किसी का भरोसा हमारे साथ होता है, तो हमारी क्षमताएंअनंत हो जाती हैं। सीख / नैतिक संदेश"यदि आपको ईश्वर पर भरोसा है, तो आपको वही मिलेगा जो भाग्य मेंलिखा है। लेकिन यदि आपको स्वयं पर और अपनों के विश्वास परभरोसा है, तो ईश्वर भी आपकी तकदीर वैसे ही लिखेगा जैसा आपचाहेंगे। भरोसा वह ऊर्जा है जो साधारण मनुष्य से भी असाधारण कार्यकरवा लेती है।" भूपेंद्र कुलदीप कीअन्य किताबें भी आमेजन पर उपलब्ध हैं कृपया खरीदें और अवश्य पढ़ें फीडबैक denbhupendrakuldeep76@gmail.com9827153834