शीर्षक: अंधेर रातPart 2 — दरवाज़े के उस पारकाँच के दरवाज़े पर बनी वह भीगी हथेली कुछ सेकंड तक स्थिर रही। आयुष की साँसें इतनी तेज चल रही थीं कि उसे खुद अपनी धड़कनें सुनाई दे रही थीं। कमरे में अंधेरा था, सिर्फ फोन की फ्लैशलाइट काँपते हाथों में हिल रही थी। बाहर बारिश और तेज हो चुकी थी।हथेली धीरे-धीरे काँच से हट गई। उसके हटते ही पानी की लकीरों के बीच वही नाम चमक उठा—AYUSHआयुष दो कदम पीछे हट गया। उसके पैरों से टेबल टकराई और कुर्सी गिर पड़ी। आवाज़ पूरे कमरे में गूँज गई। वह कुछ सेकंड वहीं