उसके समान कोई नहीं

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ऋगुवेद सूक्ति-- (४०) की व्याख्यान त्वदन्यो मघवन्नस्य मर्दिता --ऋगुवेद--१/८४/१९भावार्थ --हे मघवन(ईश्वर) ! आपके सिवा  दूसरा सुख देने वाला कोई नहीं है।“न त्वदन्यो मघवन्नस्य मर्दिता”पद–व्याख्यान — नहींत्वत् अन्यः — आपसे अन्य, आपके अतिरिक्तमघवन् — हे दानी प्रभु (इन्द्र के लिए प्रयुक्त संबोधन)अस्य — इस (जगत / भक्त) कामर्दिता — कष्ट दूर करने वाला, दुःख का नाश करने वालाभावार्थ--हे प्रभु! आपके अतिरिक्त इस संसार में दुःखों को दूर करने वाला और सच्चा सुख देने वाला दूसरा कोई नहीं है।संक्षिप्त व्याख्या--ऋग्वेद के इस वाक्य का तात्पर्य यह है कि परमात्मा ही संसार का वास्तविक सहायक और रक्षक है।वही मनुष्य के दुःखों का नाश