बेड़ियां

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बेड़ियांरात के 2:37 बज रहे थे।पूरा शहर नींद में डूबा था, लेकिन आरव के कमरे की लाइट अब भी जल रही थी।कमरे में किताबें खुली पड़ी थीं, लैपटॉप चालू था, टेबल पर कॉफी का कप आधा भरा था... लेकिन आरव का ध्यान किसी भी चीज़ पर नहीं था।उसकी आंखें बस मोबाइल स्क्रीन पर थीं।एक रील खत्म होती, दूसरी शुरू हो जाती।किसी की luxury car, किसी की foreign trip, किसी का six-pack body, किसी का startup success, किसी का perfect relationship.हर वीडियो के साथ आरव को लगता—“सबकी life set है... बस मेरी ही बेकार है।”वो phone नीचे रखता, फिर दो मिनट