मंजिले - भाग 46

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--------" कब्ज " एक हैरत अंदाज की कहानी --- " न मुराद ये बीमारी हमें ही नहीं, मेरे जिगर को भी है। मेरी बेगम सलमा को भी है, और बेटी नसीबा को भी है। " जैसे नबाब पिता अब्दुल रो पड़ा। हकीम बुखारी के आगे। अब एक घर है। हेवीलिया कहा है, सरकार ने सब कुछ खो लिया। अब नबाबो की जिंदगी सिमट गयी सात या आठ मरले मे, बस। कुछ न आगे दिखता था न पीछे। नबब्यादी अब कहा थी। पेशन थी, अंग्रेजो के समय की वोही बस लगी हुई... ऊपर से ये बीमारी, पीछा कहा छोड़ती है। तीन