केशव किसी तरह धक्कामुक्की से निकलते हुए सप्त क्रांति ट्रेन में चढ़ पाया।पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन लोगों से खचाखच भरा हुआ था—किसी की आँखों में बिछड़ने का दर्द था, तो किसी के चेहरे पर मिलने की खुशी।शोर-गुल, पुकारते कुली, रोते बच्चे और विदाई के आँसू... सब कुछ मिलकर एक अजीब-सी हलचल पैदा कर रहे थे।बस हर कोई अपने-अपने सफ़र में डूबा है।वो मन ही मन बुदबुदाया—"ना मंजिल का पता...ना है कोई ठिकानामुसाफ़िर हूँ यारो… काम है तो बस चलते जाना।"अपने डिब्बे में पहुँचकर केशव ने हाथ में टिकट देखा और फिर नजरें सीट नंबर पर टिकाईं।उसकी भौंहें तन गईं।सीट पर