तक़लीफ़ दोपहर की धूप अपनी पूरी तल्खी के साथ शहर की पुरानी सिविल लाइन की मंत्री निवास की बिल्डिंग पर झुकी हुई थी। बाहर खड़े नीम के पेड़ की छाया भी जैसे सिमटकर खुद में सिमट गई थी। भीतर, दूसरी मंज़िल के एक बंद कमरे में ए.सी. की ठंडी हवा बह रही थी—एक ऐसी ठंडक, जो बाहर की तपती ज़मीन से बिलकुल अलग थी। कमरे में मंत्री हरकिसन अपनी भारी-भरकम कुर्सी पर टिके बैठे थे। सफ़ेद कुरता-पाजामा, कंधे पर हल्की-सी अँगोछे की तह, और माथे पर पसीने की जगह संतोष की चिकनाहट। सामने चार कुर्सियाँ थीं, जिन पर बैठे थे—पंडित