४ऋगुवेद सूक्ति-- (४२) की व्याख्या करो यत्र वरिवो बाधिताय।६/१८/१४भावार्थ --पीड़ितों की सहायता करने वाले हाथ ही उत्तम है। मंत्र +-ऋग्वेद ६/१८/१४—उसका भावार्थ “पीड़ितों की सहायता करने वाले हाथ ही उत्तम हैं” । मूल भाव--मंत्र में “वरिवः” का अर्थ है मार्ग, अवसर या सहायता, और “बाधिताय” का अर्थ है जो कष्ट या बाधा से पीड़ित हो।इस प्रकार यह मंत्र संकेत करता है कि जो व्यक्ति दुःखी, पीड़ित या संकटग्रस्त है, उसके लिए मार्ग बनाना, उसकी सहायता करना—यही श्रेष्ठ कर्म है। व्याख्यायह सूक्ति हमें सिखाती है कि परहित सर्वोच्च धर्म है।वेदों में बार-बार यह बताया गया है कि दूसरों के दुःख को दूर करना ही सच्चा धर्म