----------------- टाम ज़िंदा है --------------17 वी किश्त पर आधारित.... कल की तरा आज भी वही से सूरज डूब रहा था। वही हलचल थी। बज़ारो मे भीड़ भड़का था। कोई इधर कोई उधर भाग रहा था। जिंदगी की भागदौड़ मे हम तन्हाई के सिवा कुछ नहीं लेते। "कया खरीद ते हो किसी गरीब के पास से, पता नहीं... जज्बात एक दिन का सास भी नहीं ले पाते... शायद। ललचारी देखी है आपनी, सब कुछ होते भी कुछ नहीं होता... बस यही सोच सब को खंगाल रही है... तोड़ रही है...