मूक क्रंदन

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    "कुछ चाय वाय पी हो कि नहीं?-सुबह उठते ही रियाज़ करने बैठ जाती हो बिटिया! " दद्दा के पूछने पर मेरे हाथ की उंगलियां सितार के तारों पर वहीं रुक गईं और उनकी लाड़ भरी परवाह मुझे अभीभूत कर गई। मैंने उनकी भावनाओं को समझते हुए कहा , " हम चाय पीकर बैठे हैं दद्दा,  काहे चिंता किए जाते हो?" और सितार के तारों पर मेरे बाएं हाथ की उंगलियां पुनः दबने व दाहिने हाथ से मिज़राब तार के स्वरों पर नृत्य करने लग गया था। मेरी दिनचर्या का आग़ाज़ यहीं से होता है कई वर्षों से ।