अपने यहॉं

  • 306
  • 114

​अपने यहाँकमल चोपड़ा​बीच में उसका वह डर लगभग खत्म हो गया था, जो उसे शुरू-शुरू में लगता था और जिसने इन दिनों फिर से उसे घेर लिया था। यहाँ रहते हुए उसे दस साल हो गये थे, उसे यह लगता नहीं था कि वे यहाँ किराये के मकान में रह रहे हैं और कि यह मुहल्ला हिन्दुओं का है।​बुजुर्ग मकान-मालिक और मालकिन जिन्हें कि वे 'जी बाबूजी' और 'जी अम्माजी' कहकर पुकारते थे, कभी लगा ही नहीं कि गैर हैं या दूसरे मजहब के हैं।​जिन्नी अभी तक नहीं लौटी थी। रत्ना स्टोरवाले लाला से नमक की थैली लेने गयी थी।