मुजरिम

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​मुजरिमकमल चोपड़ा​शोर-शराबा तो ऐसे मचा था जैसे कोई जीता-जागता आतंक गाँव में घुस आया हो, अपना-अपना काम वहीं छोड़कर बच्चे-बूढ़े बाहर निकल पड़े थे, देखा तो सामने से एक अधबूढ़ा-सा आदमी चला आ रहा था। चेहरे पर उगे काले-सफेद खूँटें, धँसी हुई आँखें और उसकी झुर्रिदार काली चमड़ी से पता लग रहा था कि वह पैंतालीस-छियालीस साल खा-बिता चुका है। फटा हुआ कोट और नाप से बड़े जूते उसके हुलिए को और भी गया-गुज़रा बता रहे थे। फिर भी उसके आगमन से हलचल-सी मच गयी थी। हैरान थे सब—ये है कौन?​पुराने लोगों के चेहरे खिले हुए थे। अधीर होकर ये