ऋगुवेद सूक्ति-- (62) की व्याख्या "न मृष्यसे"ऋगुवेद --1/116/2हार मत मानो। सामना करो।“न मृष्यसे” (ऋग्वेद 1/116/2) का अर्थ थोड़ा सूक्ष्म है, इसलिए इसे सही संदर्भ में समझना ज़रूरी है।शब्दार्थ:न = नहींमृष्यसे = सहते हो / सहन करते हो / क्षमा करते हो इस प्रकार “न मृष्यसे” का शाब्दिक अर्थ होता है:“तुम सहन नहीं करते” या “तुम अन्याय को बर्दाश्त नहीं करते”भावार्थ:आपने जो लिखा — “हार मत मानो। सामना करो।” — यह पूरी तरह गलत नहीं है, बल्कि प्रेरणात्मक (motivational) अर्थ में इसे ऐसे लिया जा सकता है: “अन्याय या विपत्ति को चुपचाप मत सहो, उसका सामना करो।”निष्कर्ष:शाब्दिक अर्थ: सहन न करना / बर्दाश्त न