नो एंट्री बनी रही

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          वाजिद हुसैन सिद्दीक़ी की कहानी   कमरे में मोटे पर्दे पड़े थे। बाहर शाम कब उतर आई, इंद्राणी को पता ही नहीं चला। वह किताब खोले हुए थी, पर पढ़ कम रही थी- ज़्यादा अपने को भीतर से पढ़ रही है या फिर अपने भीतर कहीं जमा बीते हुए वर्षों को उलट-पलट कर देख रही है। किताब उसके वर्तमान में थी, पर उसका मन अतीत के गलियारों में भटक रहा था। वह डाइनिंग टेबल पर बैठी थी। जब खाने पीने का काम नहीं होता था उसका सामान फैला रहता और खाने का समय हो जाता तब वह अपनी किताबें कागज़ों और लैपटॉप