पूर्वांचल के एक छोटे से गाँव में नंदिनी रहती थी—मिट्टी के घर, कच्ची गलियाँ और सपनों से भरी आँखें। घर में गरीबी थी, लेकिन उसके इरादे बहुत अमीर थे। माँ अक्सर कहतीं—“बेटी, जिंदगी आसान नहीं है।” और वह हँसकर जवाब देती—“तो क्या हुआ, मैं भी आसान नहीं हूँ।”बचपन से ही नंदिनी पढ़ाई में तेज थी। स्कूल के मास्टर जी उसे हमेशा आगे बढ़ने के लिए कहते, लेकिन घर की हालत उसे हर बार पीछे खींच लेती। कई बार फीस भरने के पैसे नहीं होते, तो वह दूसरों के घरों में काम करके पैसे जुटाती। उसकी हथेलियों पर मेहनत के निशान