टूटा-सा कोई दरवाजा

​टूटा-सा कोई दरवाजा​रात काफी हो गयी थी। आसपास की झुग्गियों से खड़कते हुए बरतनों, बिलबिलाते हुए बच्चों, कलपती हुई बुढ़ियों, खाँसते-खँखारते हुए बूढ़ों, झींकती हुई स्त्रियों और शराब के भभूके से भरी गलियों की आती हुई आवाजें कुछ कम हो गयी थीं।​उन झुग्गियों को एक सँकरी-सी गली के बीचोंबीच बैठा खजुआया कुत्ता अपनी पिछली टाँग से अपना कान खुजा रहा था। दूर से गिरते-पड़ते आते हुए एक शराबी को देखकर कुत्ता अपनी नैतिक जिम्मेवारी के तहत उठ खड़ा हुआ था। नशे के बावजूद शराबी की नजर कुत्ते पर पड़ी तो घबराहट के मारे पसीना-पसीना हो गया। ज्यों ही कुत्ते ने