कहानी: कारखाना “आप अगर मेरा साथ दोगे तो मैं अपने कारखाने को मिला इतना बड़ा ऑर्डर स्वीकार कर पाऊंगा… नहीं तो मैं मना कर देता हूँ।” तरुण भल्ला की आवाज़ में एक अजीब-सी सधी हुई नरमी और आत्मीयता थी—जैसे हर शब्द पहले से तौलकर रखा गया हो। वह बोलते समय हल्का-हल्का मुस्कुरा भी रहा था, लेकिन उसकी आंखें सीधे मजदूरों के चेहरों को टटोल रही थीं—किसके मन में क्या चल रहा है, वह पढ़ लेना चाहता था। कारखाने के बड़े सेड में उस वक्त करीब पचास मजदूर खड़े थे। मशीनों की आवाज़ बंद थी, लेकिन उनके कानों में उसकी