आपदधर्म

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आपदधर्म                    “चरण- स्पर्श, ताऊजी,” बाहर के बरामदे से बहू की आवाज़ मेरे कमरे तक चली आई।                  “जीती रहो, बहू, जीती रहो,” यह आशीर्वाद तो बड़े भाई का था।                  मुझ से मिलने वह फिर चले आए क्या?                 अभी पंद्रह दिन पहले ही तो मुझे देख कर गए थे।                 “यह नई एस.यू.वी. आप की है, ताऊ जी?”बहू ने पूछा।