आड़

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​आड़ कमल चोपड़ा    ​कई दिनों से असद ने न तो गायत्री को ही चराई के लिए भेजा था और न वह खुद ही घर से बाहर निकला था। जिस कोठरी में वे खुद रहते-सोते थे, उसमें एक खूँटा गाड़कर उसने गायत्री को बाँधना शुरू कर दिया था और जहाँ पहले गायत्री बँधती थी, उस पर छप्पर के नीचे वह खुद रहने लगे थे। असद तो गायत्रीवाली कोठरी के दरवाज़े पर चारपाई बिछाकर दिन-रात उसकी रखवाली कर रहा था। गायत्री की हिफाजत में अपनी तरफ से कहीं कोई कसर नहीं छोड़ रहा था। हर आहट पर उसकी रूह जैसे काँपकर