सेंध धूप की एक धार मंदिर के अधबने प्रांगण में तिरछी कटती हुई गिर रही थी। हवा में महीन धूल तैर रही थी—इतनी हल्की कि दिखती नहीं, पर सांस में चुभती रहती है। खंभा धीरे-धीरे कांपा। रामलाल ने गर्दन उठाई। उसकी आँखें सिकुड़ीं, जैसे किसी अदृश्य खतरे को पढ़ने की कोशिश कर रही हों। “कुछ गड़बड़ है…”—उसके होंठ हिले, आवाज़ पूरी बनी भी नहीं थी। और तभी—धड़ाम! गिरते हुए पत्थर की आवाज़ ने जैसे भीतर कहीं एक पुरानी दरार को भी तोड़ दिया। कलेक्टर जब पहुँचे, उनके जूतों की ठक-ठक पत्थर पर गूंज रही थी। उनके चेहरे पर स्थिरता