कर्ज़ हेड क्लर्क नागर ने अपनी मेज़ पर रखी पीतल की पुरानी घंटी को उँगलियों से दो बार थपथपाया—“टन्… टन्…”। दफ्तर की दीवारों से टकराकर वह आवाज़ बाहर बरामदे तक पहुँची, जहाँ दोपहर की ढलती धूप फर्श पर लकीरों की तरह पसरी हुई थी। लेकिन उस आवाज़ का बिसुन पर कोई असर नहीं हुआ। वह बरामदे में रखे लकड़ी के पुराने स्टूल पर बैठा था—झुकी हुई पीठ, ढीले कंधे, और आँखें जैसे किसी अनदेखे क्षितिज में गड़ी हुईं। उसके होंठ हल्के-हल्के हिल रहे थे, मानो वह कोई हिसाब बुदबुदा रहा हो—पर वह हिसाब कागज़ पर नहीं, भीतर कहीं चल