कागज़ सहाय मास्साब ने अपने पुराने, हल्के फट चुके भूरे बैग को धीरे से खोला। अंदर रखी नोटों की गड्डी को उँगलियों से दबाकर जैसे तसल्ली कर ली—पूरा दस हजार है। फिर बैग को ऐसे बंद किया मानो कोई राज़ छिपा रहे हों। धोती का किनारा थोड़ा ऊपर खिसक गया था, उसे ठीक करते हुए उन्होंने चारों तरफ नजर दौड़ाई। पेंशन कार्यालय की दीवारों पर पान की पीक जमी थी, फाइलों के ढेर पर धूल की मोटी परत। पंखा चर्र-चर्र की आवाज़ करता हुआ घूम रहा था। वे बेंच पर बैठे थे—सुबह से। घड़ी में तीन बज चुके थे। “मास्साब,