साहूकार

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साहूकार दोपहर की धूप गाँव के चौपाल पर ऐसे पसरी थी जैसे किसी बूढ़े की थकी हुई साँसें। बबूल के पेड़ की छाया में बैठे लोग चुनाव की चर्चा में डूबे थे। इसी बीच छम्मी सेठ की कोठी से बुलावा आया—“मानक को तुरंत भेजो।” मानक उस समय अपने आँगन में टूटी चारपाई पर बैठा, फटी बनियान में पसीना पोंछ रहा था। उसकी आँखों में वही पुरानी थकान थी—गरीबी की, मजबूरी की, और सबसे ज्यादा—कर्ज़ की। कोठी में कदम रखते ही उसे लगा जैसे वह किसी और दुनिया में आ गया हो। चमचमाता फर्श, दीवारों पर लगी तस्वीरें, और बीच में