अधूरी सुरक्षा

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 अधूरी सुरक्षा कलेक्ट्रेट परिसर की दोपहर हमेशा की तरह शोर और भागदौड़ से भरी हुई थी। धूल से अटे रास्तों पर इधर-उधर भागते लोग, फाइलों का बोझ उठाए बाबू, और पसीने से तरबतर फरियादी—सब मिलकर एक ऐसा दृश्य रच रहे थे, जहाँ उम्मीद और निराशा साथ-साथ चलती दिखती थी। जतिन, करीब 32 वर्ष का, सादा खादी का कुर्ता-पायजामा पहने, कंधे पर झोला डाले, ट्रेजरी ऑफिस से बाहर निकल रहा था। उसके चेहरे पर काम निपटाने की हल्की संतुष्टि थी, लेकिन आँखों में हमेशा की तरह समाज की उलझनों को समझने की बेचैनी भी थी। जैसे ही उसने दहलीज पार की,