नीरव आसरात के ठीक दो बजे थे। मोबाइल की तीखी घंटी ने सन्नाटे को ऐसे चीर दिया जैसे किसी शांत तालाब में अचानक पत्थर फेंक दिया गया हो। चंपा की नींद हड़बड़ा कर खुली। आँखें आधी खुली थीं, शरीर अभी नींद में डूबा हुआ, पर मन बेचैन हो उठा।“हेलो…” उसने उनींदी आवाज़ में कहा।उधर से यामिनी की आवाज़ आई—थकी हुई, बुझी हुई—“चंपा… कल का प्रोग्राम कैंसिल… तुम आराम से सो जाना… सुबह स्टेशन मत आना…”फोन कट गया।बस इतना ही।चंपा कुछ क्षण तक मोबाइल को देखती रह गई। जैसे शब्द उसके कानों तक तो पहुँचे, पर दिमाग ने उन्हें स्वीकार करने