अंतिम इंतज़ार गाँव के आख़िरी सिरे पर खड़ा वह मकान जैसे समय के सामने हार मान चुका था। दीवारों की पलस्तर जगह-जगह से झड़ गई थी। आँगन में लगे नीम के पेड़ की छाया दोपहर की धूप को जैसे रोकने की नाकाम कोशिश कर रही थी। अभी थोड़ी देर पहले ही गाँव के डॉक्टर सिंह साहब वहाँ से निकलकर गए थे। उनके जाते समय चेहरे पर वही झिझक भरी गंभीरता थी, जो डॉक्टर तब ओढ़ लेते हैं जब वे जान जाते हैं कि दवा से ज़्यादा अब समय काम करेगा। बैठक के बीचोंबीच पुरानी चारपाई पर धन्नूलाल लेटे थे।