Episode 4: जाल बिछ चुका हैरात गहरी हो चुकी थी।हवेली के गलियारे अब और भी सुनसान लग रहे थे।भार्गवी अपने कमरे में वापस आ चुकी थी—लेकिनउसकी आँखों में नींद नहीं…योजना चल रही थी।वो खिड़की के पास खड़ी थी,जब अचानक— फोन वाइब्रेट हुआ।उसने तुरंत फोन उठाया।स्क्रीन पर कोई नाम नहीं था।बस एक नंबर।उसने बिना हिचक कॉल रिसीव की।“हेलो…”दूसरी तरफ से धीमी, लेकिन सख्त आवाज़ आई—“हवेली में घुस गई हो…”भार्गवी की आँखें हल्की सिकुड़ीं।“हाँ।”“अब बस…शिकार के लिए जाल बिछाना बाकी है।”कुछ सेकंड की खामोशी।“और याद रखना—एक गलती… और सब खत्म।”कॉल कट।भार्गवी ने फोन नीचे किया।उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आई। “खेल शुरू