अन्तर्निहित - 40

  • 1.6k
  • 252

[40]अभीतक शांति से सब कुछ सुन रहे येला और वत्सर के अधिवक्ता श्री हरीश ने खड़े होकर कहा, “चलो, एक क्षण के लिए मेरे मित्र कपिलजी के कुतर्क को भी स्वीकार लेते हैं। तो ...”“देखो महाशय, हरीशजी ने मेरी बात को स्वीकार लिया है। अर्थात वत्सर ने हत्या की है यह सिद्ध हो जाता है। इस अभियोग में अब और कुछ शेष रहा ही नहीं।” कपिल ने उत्साह और उत्तेजना प्रकट की। “श्रीमान कपिल जी, शब्दों को पूरा सुनने का अभ्यास छूट गया है आपका। होता है। इस बढ़ी हुई आयु में अनेकों के साथ ऐसा होता है। यह सहज है।”