हीरालाल जी जब गोदाम पहुंचे तो उन्होंने देखा कि उनके स्वप्न में जो नज़ारा था, गोदाम में वैसा कुछ भी नहीं था। एक बल्ब प्रज्वलित हो रहा था जैसे कि अंधेरी रात में उम्मीद की किरण सवेरा जरूर होगा ये गुनगुना रही हो, उन्होंने राहत भरी लम्बी श्वास ली और मटकी में से शीतल जल ग्रहण किया और छड़ी लेके घर लौट आये। बच्चे सो रहे थे सुप्रभात होने में अभी समय था, उन्होंने बिस्तर में जाने के बजाय माला जपना उचित समझा और रामधुन में मगन हो गए।पिताजी उठिए एक उच्च स्वर में वाणी ने हीरालाल जी को जगाया,