ये मेरी चार साल पुरानी रचना थी। जिसे मैने तब पब्लिश नहीं किया था क्योंकि लैपटॉप खराब हो गया था। उस समय मेरी ज्यादातर कहानियां फैमिली पर ही होती थी। शहर की चकाचौंध से दूर, उस पुराने घर की दीवारें अब सिसक रही थीं। काया जा चुकी थी। जैसे ही उसे अहसास हुआ कि भूपेंद्र की जेब और उसका जिस्म अब उसके किसी काम के नहीं रहे, वह एक रात चुपचाप घर का बचा-कुचा कीमती सामान और गहने लेकर रफूचक्कर हो गई। वह किसी नए साहब की तलाश में निकल गई थी, क्योंकि उसकी फितरत में बसना नहीं, उजाड़ना लिखा था।