भूपेंद्र के जीवन का सूरज अब पूरी तरह अस्त हो चुका था। जिस साहब वाली छवि को बचाने के लिए उसने अपना घर फूँक दिया था, अब वही छवि बाज़ार के चौराहों पर नीलाम हो रही थी। पंद्रह हज़ार की नौकरी में वह दफ्तर के सबसे निचले पायदान पर था। जहाँ पहले उसके नीचे दर्जनों कर्मचारी काम करते थे, आज वहाँ उसे छोटे-छोटे कामों के लिए झिड़का जाता था। फटे हुए कॉलर और घिसी हुई चप्पलों में भूपेंद्र जब दफ्तर की कैंटीन में बैठता, तो लोग उसे देखकर कानाफूसी करते और उसकी कंगाली का मज़ाक उड़ाते।घर में तो स्थिति और