बिस्तर पर अब सिर्फ वासना का खेल चरम पर था। भूपेंद्र ने काया के दोनों हाथों को अपने एक हाथ से पकड़कर उसके सिर के ऊपर ले जाकर लॉक कर दिया। काया का बदन बेबस था, पर उसकी मुस्कान विजयी थी। भूपेंद्र का दूसरा हाथ काया के शरीर पर बड़ी निर्लज्जता से रेंग रहा था, उसकी उंगलियाँ काया के मांस को अपनी मुट्ठी में भर रही थीं।काया की साड़ी एक तरफ बेतरतीब ढंग से आधी उतरी हुई थी, उसका मखमली बदन पसीने की बूंदों से चमक रहा था। भूपेंद्र पागलों की तरह उसके होंठों को कुचल रहा था, जैसे वह