उजाले की ओर –संस्मरण

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सम्मान अथवा....बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले संस्मरण==============   स्नेहिल सुभोर मित्रो       माँ अपने सभी रूपों में सब पर अनुकंपा बनाए रखें।'माँ`संबोधन ही स्वयं में पूर्ण है। इसके आगे-पीछे कुछ सोचने, देखने की ही ज़रूरत नहीं है।जीवन जीने के मूल मंत्र को काँख में दबाए हम चक्कर काटते रहते हैं उन वीथिकाओं में, उन बीहड़ों में,उन जंगलों में, उन धूसर मार्गों पर जिनके बारे में हमें लेश मात्र भी आभास नहीं होता। बस हम चलते रहते हैं, दौड़ते रहते हैं और न जाने कब एक अंधी दौड़ में शामिल हो जाते हैं।     आज का दिन सब