MTNL की घंटी - 3

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अगले कुछ दिनों तक महक ने खुद को रोज़मर्रा के कामों में उलझाए रखा।पर जितनी कोशिश करती, उतनी ही उस अनजानी आवाज़ की परछाईं और गहरी होती जाती।रात को, जब पूरा घर नींद में डूब जाता, महक चुपचाप ड्रॉइंग रूम में आकर टेलीफोन को निहारने लगती…मानो कोई खामोश साया उसे पुकार रहा हो।अब उसे उस “रॉन्ग नंबर” वाले इंसान से एक अजीब-सी हमदर्दी होने लगी थी।उसके मन में कई सवाल बार-बार सिर उठाते—कौन है वो?देवी प्रसाद कौन है?क्या सचमुच कोई मुसीबत में है… या ये सब मेरे मन का वहम है?या फिर… ये सब सिर्फ इत्तेफाक नहीं, कोई इशारा है?इन