बेवजह की महोब्बत।

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 का समय था। शहर की पुरानी गलियों में हल्की ठंडी हवा बह रही थी। सड़क किनारे लगे पीपल के पेड़ की पत्तियाँ सरसराकर जैसे किसी अनकही कहानी की गवाही दे रही थीं। उसी शहर के एक छोटे से कमरे में, दीवार से टिककर बैठा आरव अपनी डायरी के आखिरी पन्ने पर कुछ लिख रहा था।“मुझे नहीं पता कि यह महोब्बत थी या सिर्फ़ एक आदत। लेकिन इतना ज़रूर जानता हूँ कि इसी बेवजह की महोब्बत ने मुझे बिखरकर फिर से बनना सिखाया।”लिखते हुए उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान तैर आई। आँखों के किनारों में नमी थी, मगर उस नमी में