पता ही नहीं चला कि दो महीने का समय कैसे निकल गया। शादी की तैयारियों और खरीदारी में दिन कब बीत जाते, किसी को एहसास ही नहीं होता था।घर में हर तरफ शादी की बातें चल रही थीं। कभी कपड़ों की खरीदारी होती, तो कभी गहनों और दूसरी चीज़ों की। रिश्तेदारों का आना-जाना भी बढ़ने लगा था।जैसे-जैसे शादी की तारीख नज़दीक आती जा रही थी, घर का माहौल भी और चहल-पहल से भरने लगा था।सीमा भी यह सब देखकर खुश होती थी, लेकिन उसके मन के एक कोने में हल्की-सी चिंता भी थी। वह सोचती थी कि उसकी आगे की