गन्दे

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​गन्दे​कमल चोपड़ा   अपने वक्त से कुछ पहले ही काम पर चली आयी थी मीना। आमतौर पर इस वक्त तक वे लोग सोये होते थे और वह आकर कॉलबैल बजाकर जगाती थी उन्हें, पर आज कोठी का दरवाजा खुला था। मालकिन खुद झाड़ू लेकर फर्श की धुलाई में जुटी हुई थी। पानी बहकर बाहर तक आया हुआ था। उसने अन्दर घुसते हुए हैरानी जताई, "बीबीजी! आज क्या बात है? खैर तो है..."​उसे देखते ही मालकिन चिल्ला पड़ी, "खैर  तो नहीं है...लेकिन तू? अन्दर मत आइयो...अन्दर मत आइयो!"​"क्या हुआ है?"​"तुझे नहीं पता? बड़ी भोली है ना? झूठी मक्कार, धोखेबाज, गन्दी कहीं की,