अदृश्य पीया - 25

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(सुबह का वक्त। कौशिक की हथेली में नए फ्लैट की चमचमाती चाबी है।)(वो चाबी को एक पल देखता है जैसे पुरानी ज़िंदगी को अलविदा कह रहा हो।)कौशिक (धीरे से) बोला - “चलो सुनीति…यहाँ से फिर शुरू करते हैं।”(सुनीति उसकी बाँह पकड़ लेती है।)सुनीति (मुस्कुराकर) बोली - “इस बार भागकर नहीं… ज़िंदगी की ओर चलते हुए।”(दरवाज़ा खुलता है।)(खुली बालकनी,साफ़ दीवारें,खाली कमरा पर उम्मीदों से भरा हुआ।)(सुनीति अंदर कदम रखती है। थोड़ा रुककर फर्श पर हाथ रखती है।)सुनीति बोली - “यह घर…डर से नहीं बना,सपनों से भरेगा।”(कौशिक हल्की हँसी के साथ कहता है।)कौशिक बोला - “और अब कोई नहीं कहेगा—इस घर में भूत रहता है।”(दोनों हँस