हॉल में बिखरी बेशर्मी की गूँज ने वंशिका के भीतर के धैर्य को राख कर दिया था। वह कमरे में छिपकर रोने वाली औरत नहीं थी। उसके भीतर अब वह स्वाभिमानी स्त्री जाग चुकी थी जिसे बरसों तक इस घर की तथाकथित मर्यादा के नाम पर कुचला गया था। वह तमतमाए चेहरे के साथ सीधे मनोरमा के कमरे में दाखिल हुई।मनोरमा बिस्तर पर बैठी माला जप रही थीं, पर उनके कान बाहर रसोई से आती उन अमर्यादित आवाज़ों पर ही टिके थे। वंशिका को अचानक कमरे में देख वे सकपका गईं।"मम्मी जी! चुप क्यों बैठी हैं आप?" वंशिका की आवाज़