दादासाहेब ने फ़ोन काट दिया। उन्हें अब और कुछ कहने की ज़रूरत नहीं थी। उन्हें ठीक-ठीक पता था कि क्या होने वाला है, और इससे भी ज़्यादा ज़रूरी बात यह थी कि उन्हें पता था कि इसे रोका नहीं जा सकता। उनकी दुनिया में, हवा में जलती हुई उम्मीद और ठंडे लोहे की गंध घुली हुई थी।यह अब सिर्फ़ एक शहर नहीं रह गया था; यह अपराध की एक वेदी बन चुका था। यहाँ हर कोई पापी था, और जो पापी नहीं थे, वे पीड़ित थे। यहाँ की सड़कें ऐसी कहानियों से रंगी हुई थीं जिन्हें सुनकर शैतान भी शर्म