इधर जैसे ही चित्र अपने ससुराल लौट गई,उधर उसकी भाभी रुचि के चेहरे पर अजीब-सी राहत उतर आई।वह मन ही मन खुश थी।“चलो अच्छा हुआ…छुटकारा मिला।रोज़-रोज़ इसके लिए खाना बनाना,बच्चे को संभालना,सेवा करना — अब नहीं करना पड़ेगा।”उस रात रुचि ने सुकून की साँस ली।मोबाइल उठाया और अपनी सहेली को फोन मिला दिया।“अरे सुन… मेरी ननंद गई अपने ससुराल।सच बताऊँ, एक नंबर की कैरक्टरलेस लगती है मुझे।”उधर से सहेली चौंकी —“अरे! ऐसा क्यों?”रुचि ने ज़हर घोलते हुए कहा —“जब देखो कभी मंदिर, कभी कहीं।असल में मंदिर के बहाने अपने प्रेमी से मिलने जाती है।उसके पहले पति ने ऐसे ही थोड़ी