डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 25

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वंशिका अपने अंधेरे कमरे में अकेले बैठी थी। पंखे की आवाज़ उसे किसी पुराने जख्म को कुरेदने जैसी लग रही थी। वह शून्य में ताकते हुए सोच रही थी—'गलती कहाँ हुई? कब और कैसे मेरी सत्ता मेरे ही हाथों से रेत की तरह फिसल गई?'उसने अपनी शादी के शुरुआती दिनों को याद किया। वह दौर, जब वह एक आदर्श बहू बनने की दौड़ में अपनी पहचान खो चुकी थी। ससुराल वालों की उंगली के इशारों पर नाचना उसकी दिनचर्या थी। मनोरमा ने उसे किसी कठपुतली की तरह घुमाया था। घर के अंतहीन काम, लोगों के सामने नीची गर्दन, और यहाँ