शाम ढलते ही जब भूपेंद्र और काया घर लौटे, तो घर की हवा में एक अजीब सी भारीपन थी। भूपेंद्र के चेहरे पर एक ऐसी तृप्ति और सुकून था जो महीनों बाद दिखा था, वहीं काया की चाल में अब वह मर्यादा और दबदबा नहीं था, बल्कि एक अजीब सा आत्मविश्वास था। उसकी आँखों में एक चमक थी—ऐसी चमक जो किसी युद्ध को जीतने के बाद आती है।वंशिका हॉल में बैठी सोफे पर अपनी फाइल देख रही थी। जैसे ही उसने इन दोनों को घर में प्रवेश करते देखा, उसकी पारखी नज़रों ने एक ही पल में सब कुछ भांप