शाम का धुंधलका गहराने लगा था। आसमान में नारंगी और बैंगनी रंग की लकीरें उभर आई थीं। घर में एक अजीब सी खामोशी छाई थी; मनोरमा और शिखा ड्राइंग रूम में टीवी के सामने थीं और वंशिका बच्चों को होमवर्क कराने में व्यस्त थी।भूपेंद्र ने देखा कि बालकनी में सूखे हुए कपड़े अभी भी टंगे हैं। उसने रसोई की खिड़की से झाँकती काया को इशारा किया और खुद सीढ़ियों की ओर बढ़ गया। काया समझ गई। वह हाथ पोंछती हुई दबे पाँव छत की ओर भागी।छत पर सन्नाटा था। ठंडी हवाएं चल रही थीं। जैसे ही काया ने तार से