किराये का सुकून

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किराये का सुकून शहर की भागदौड़ भरी जिंदगी में समीर एक बड़े कॉर्पोरेट ऑफिस में काम करता था। उसकी ज़िंदगी फाइलों, लैपटॉप की स्क्रीन और डेडलाइन्स के बीच सिमट कर रह गई थी। पैसे तो बहुत थे, लेकिन चैन कहीं खो गया था। हर रात जब वह अपने शानदार अपार्टमेंट की बालकनी में बैठता, तो उसे लगता जैसे वह किसी सुनहरे पिंजरे में कैद है। एक रविवार, वह बिना किसी प्लान के शहर से दूर एक छोटे से गाँव की ओर निकल पड़ा। चलते-चलते वह एक पुराने, खपरैल वाले घर के सामने रुका, जहाँ एक बूढ़ा आदमी नीम के पेड़