उम्मीद की पगडंडी

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  गाँव की ठंडी हवा और ढलते सूरज की सुनहरी रोशनी ने पूरे माहौल को एक जादुई अहसास से भर दिया था। मीरा अपने पुराने घर की पक्की दहलीज पर बैठी दूर पगडंडी को निहार रही थी। उसके पास संसाधनों की बड़ी कमी थी, लेकिन उसकी आँखों में जो सपने थे, वे आसमान से भी ऊँचे थे। गाँव के लोग जब भी उसे पुरानी किताबों के साथ देखते, तो अक्सर तंज कसते थे, "मीरा, इतना पढ़कर क्या करोगी? आखिर में तो चूल्हा-चौका ही संभालना है। शहर जाकर बड़े अफसर बनना सबके बस की बात नहीं होती।"मीरा ने कभी किसी की