ऐसे बूढ़े बैल को कौन बांध भुस देत

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ऐसे बूढ़े बैल को कौन बांध भुस दे उपरोक्त देशी कहावत मैंने दो अवसरों पर सुनी थी, दोनों अलग सन्दर्भ थे अलग अलग तरह लोगों के मुंह से इसे सुना था. पहली बार तो कहावत बूढ़े गौ पुत्र वृषभ के लिये ही बचपन में सुनी थी, जिसे दया का बिजार कहते थे. दूसरी बार बड़ा होने पर अपने सबसे चहेते कन्हैया चाचा के बारे में जो बचपन से ही मेरे हीरो रहे थे. पहली बार कुछ कहावत सामान्य लगी थी पर दूसरी बार सुन कर बहुत क्षोभ हुआ था. जब भी कहीं भी इस कहावत को देर सबेर सुनता हूँ.