अस्पताल से घर लौटते वक्त अर्जुन ने मेरा हाथ पूरे रास्ते नहीं छोड़ा।पहले जो आदमी मुझसे दूरी बनाकर रखता था…आज वही मेरी उंगलियाँ ऐसे थामे हुए था जैसे डर हो कि मैं फिर कहीं खो न जाऊँ।गाड़ी की खिड़की से बाहर देखते हुए मैंने धीरे से पूछा—“आप इतने चुप क्यों हैं?”वह कुछ पल मुझे देखता रहा।“अगर उस रात तुम्हें कुछ हो जाता… तो मैं खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाता,” उसकी आवाज़ भारी थी।मेरे दिल में हल्की-सी मुस्कान आ गई।“तो आपको फर्क पड़ता है?”उसने गाड़ी साइड में रोकी।पहली बार… उसने बिना झिझक मेरी आँखों में देखा।“फर्क?”“मीरा… तुम अब मेरी